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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 102
एकान्त्रं मदमात्सर्यं गन्धपुष्यविभूषणम्। ताम्बूलाभ्यञ्जने क्रीडा भोगाकाङ्क्षा रसायनम् ॥
एकात्र, घमण्ड और मत्सरता, गन्ध, पुष्प, आभूषण, पान खाना, तेल लगाना, क्रीड़ा, भोग की आकांक्षा, रसायन,
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