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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 41
सर्वभावान्तरस्थाय चैत्यमुक्तचिदात्मने। प्रत्यक्नैतन्यरूपाय मह्यमेव नमो नमः ॥
यह मुक्तात्मा सभी तरह की भावनाओं में स्थायी रूप से स्थित रहता है, यह चैत्य अवस्था से भी मुक्त चिदात्मा है। इस प्रत्येक चैतन्य रूप वाले आत्मा को नमस्कार है।
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