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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 54
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। यः समः सर्वभूतेषु जीवितं तस्य शोभते ॥
जिसमें अकर्तापन का भाव विद्यमान है, जिसकी बुद्धि में आसक्ति नहीं है, जो समस्त भूत-प्राणियों को समान भाव से देखता है, निश्चय ही उसी का जीवन शोभनीय है।
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