त्यज धर्ममधर्मं च उभे सत्यानृते त्यज।
उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तत्त्यज ॥
(संन्यासी को) सभी प्रकार के धर्म-अधर्म तथा सत्य-असत्य— दोनों का ही परित्याग कर देना चाहिए।
तदनन्तर जिसके द्वारा इस प्रकार सत्य और असत्य का परित्याग किया जाता है, उसका भी त्याग कर देना चाहिए।
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