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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 42
विचित्राः शक्तयः स्वच्छाः समा या निर्विकारया। चिता क्रियन्ते समया कलाकलनमुक्तया ।। कालत्रयमुपेक्षित्र्या हीनायाश्चैत्यबन्धनैः। चितश्चैत्यमुपेक्षित्र्याः समतैवावशिष्यते ॥
कला एवं कल्पनाविहीन चित्रशक्ति से ही इन विचित्र, स्वच्छ तथा समभाव सम्पन्न शक्तियों का प्राकट्य हुआ है। यह चित् शक्ति तीनों कालों में सर्वाधिक शक्ति सम्पन्न, दृश्यजगत् के बन्धनों से मुक्त है।
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