मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 42
विचित्राः शक्तयः स्वच्छाः समा या निर्विकारया। चिता क्रियन्ते समया कलाकलनमुक्तया ।। कालत्रयमुपेक्षित्र्या हीनायाश्चैत्यबन्धनैः। चितश्चैत्यमुपेक्षित्र्याः समतैवावशिष्यते ॥
कला एवं कल्पनाविहीन चित्शक्ति से ही इन विचित्र, स्वच्छ तथा समभाव से सम्पन्न शक्तियों का प्राकट्य हुआ है। यह चित्शक्ति तीनों कालों में सर्वाधिक शक्तिसम्पन्न तथा दृश्यजगत् के बन्धनों से मुक्त है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
संन्यास के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

संन्यास के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें