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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 34
दृश्यदर्शनयोर्लीनं क्षयि क्षणविनाशिनोः। केवले द्रष्टरि क्षीणं रूपं नाहमचेतनः ॥
इसी प्रकार दृश्य एवं दर्शन के विलीन हो जाने पर विनष्ट हो जाने वाला अचेतन, जड़ अनुभव भी मैं नहीं हूँ। मैं तो केवल द्रष्टा मात्र हूँ।
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