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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 107
सुजीर्णोऽपि सुजीर्णासु विद्वांस्त्रीषु न विश्वसेत्। सुजीर्णास्वपि कन्थासु सज्जते जीर्णमम्बरम् ।।
वृद्धावस्था को प्राप्त विद्वान् संन्यासी को वृद्धा स्त्री पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए; क्योंकि पुरानी गुदड़ी (कथरी) में पुराना वस्त्र ही लगाया जाता है।
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