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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 39
मयैवैताः स्फुरन्तीह विचित्रेन्द्रियवृत्तयः । तेजसान्तः प्रकाशेन यथाग्निकणपतयः ॥
ये सभी इन्द्रियों की विचित्र एवं भिन्न-भिन्न प्रकार की वृत्तियाँ (पंक्तियाँ) मेरे अन्तःकरण के प्रकाश से ही प्रादुर्भूत होती हैं। जैसे-अग्नि से चिनगारियाँ निःसृत होती हैं।
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