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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 113
प्रतिगृह्य यतिश्चैतान्यतत्येव न संशयः । अद्वैतं नावमाश्रित्य जीवन्मुक्तत्वमाप्नुयात् ॥
उसे तो अद्वैतरूपी नौका में आसीन होकर जीवन-मुक्ति को अवस्था प्राप्त कर लेनी चाहिए।
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