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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 85
भिक्षाटनसमुद्योगाद्येन केन निमन्त्रितम्। अयाचितं तु तद्वैक्षं भोक्तव्यं च मुमुक्षुभिः ॥
भिक्षा के लिए विचरण करते समय संन्यासी को यदि कोई (व्यक्ति) निमंत्रित करे, तो उस (व्यक्ति) के यहाँ (अयाचित) भिक्षा ग्रहण कर लेना चाहिए।
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