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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 96
आसनं पात्रलोपश्च संचयः शिष्यसंचयः। दिवास्वापो वृथालापो यतेर्बन्धकराणि षट् ॥
आसन, पात्रलोप (बर्तन को चाह), सञ्चय, शिष्य बनाना, दिन में शयन करना तथा बेकार की बातें करना इत्यादि ये छः प्रकार के कार्य संन्यासी को बन्धन में डालने वाले हैं।
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