दैन्यभावात्तु भूतानां सौभगाय यतिश्चरेत्।
पक्कं वा यदि वाऽपक्कं याचमानो व्रजेदधः ॥
संन्यासी को दूसरे अन्य भूत-प्राणियों के कल्याण हेतु दीनता (दया) का आचरण करना चाहिए। पका हुआ या फिर बिना पका हुआ अन्न माँगने से संन्यासी निम्न गति को प्राप्त करता है।
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