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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 93
घृतसूपादिसंयुक्तमन्त्रं नाद्यात्कदाचन। पात्रमस्य भवेत्पाणिस्तेन नित्यं स्थितिं नयेत् । पाणिपात्र हरन्योगी नासकृद्वैक्षमाचरेत् ॥
घृत एवं सूपादि (चटनी, मिर्च मसाला आदि) से युक्त पकवान को कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए। संन्यासी के लिए उसका हाथ भोजन ग्रहण करने का पात्र है। उस हाथ रूपी पात्र में सर्वदा भिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। इस प्रकार संन्यासी को दिन में एक ही बार भोजन ग्रहण करना चाहिए।
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