संन्यासी को सभी तरह के प्रपञ्च अर्थात् माया को ज्ञानाग्रि में भस्म कर देना चाहिए। जो संन्यासी अपनी अन्तरात्मा में ज्ञानरूपी अग्नि को समारोपित कर लेता है, वही महान् ज्ञानी अग्रिहोत्री कहलाता है।
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