मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 117
प्रपञ्चमखिलं यस्तु ज्ञानाग्नौ जुहुयाद्यतिः । आत्मन्यग्नीन्समारोप्य सोऽग्निहोत्री महायतिः ॥
संन्यासी को सभी तरह के प्रपञ्च अर्थात् माया को ज्ञानाग्रि में भस्म कर देना चाहिए। जो संन्यासी अपनी अन्तरात्मा में ज्ञानरूपी अग्नि को समारोपित कर लेता है, वही महान् ज्ञानी अग्रिहोत्री कहलाता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
संन्यास के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

संन्यास के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें