दो बार भोजन कदापि न करे। जो मुनि गौ की भाँति केवल मुख से भोजन ग्रहण करता है, (संचित नहीं करता) यह सभी में समभाव प्रात करके अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है।
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