चेतनं चित्तरिक्तं हि प्रत्यक्ङ्केतनमुच्यते।
निर्मनस्कस्वभावत्वान्न तत्र कलनामलम् ॥
जब चेतन तत्त्वचित्त-मुक्त हो जाता है, तभी वह आत्मरूप चैतन्यतत्त्व कहलाता है।
जब स्वभाव-मन(इच्छा) से रहित हो जाता है, तब उसमें किसी भी प्रकार के दोष प्रकट नहीं होते।
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