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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 60
चेतनं चित्तरिक्तं हि प्रत्यक्ङ्केतनमुच्यते। निर्मनस्कस्वभावत्वान्न तत्र कलनामलम् ॥
जब चेतन तत्त्व 'चित्त-मुक्त' हो जाता है, तभी यह आत्मरूप चैतन्य तत्त्व कहा जाता है। जब स्वभाव-मन (इच्छा) रहित हो जाता है, तब उसमें किसी भी तरह के दोष प्रकट नहीं होते।
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