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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 27
परमहंसः शिखायज्ञोपवीतरहितः पञ्चगृहेषु करपात्री एककौपीनधारी। शाटीमेकामेकं वैणवं दण्डमेकशाटीधरो वा भस्मोद्धूलनपरः सर्वत्यागी ॥
'परमहंस' संन्यासी शिखा यज्ञोपवीत से विहीन पाँच घरों से हाथ रूपी पात्र में भिक्षा प्राप्त करने वाला, एक लंगोटी, एक चादर तथा एक बाँस का दण्ड अपने पास में रखने वाला होता है अथवा शरीर पर भस्म धारण कर एक चादर ही अपने पास रखता है और सभी कुछ का परित्याग कर देता है।
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