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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 9
संन्यासिनं द्विजं दृष्ट्वा स्थानाच्चलति भास्करः। एष मे मण्डलं भित्त्वा परं ब्रह्माधिगच्छति ॥
संन्यासी द्विज को देखकर सूर्यदेव भी मानो अपने स्थान से विचलित होकर कहते हैं — "यह संन्यासी मेरे मण्डल को भेदकर उस परब्रह्म को प्राप्त करेगा, जो सबसे परे और परम है।"
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