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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 62
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्त्रुन्मिषन्निमिषन्नपि । निरस्तमननानन्दःद संविन्मात्रपरोऽस्म्यहम् ॥
यद्यपि मैं प्रलाप करता, परित्याग करता, स्वीकार करता, चक्षुओं को खोलता एवं बन्द करता रहता हूँ, फिर भी मैं मननशील, आनन्दस्वरूप, संवित् (ज्ञानरूप) आत्मा ही हूँ।
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