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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 84
प्रातःकाले च पूर्वेद्युर्यद्भक्तैः प्रार्थितं मुहुः । तद्वैक्षं प्राक्प्रणीतं स्यात्स्थितिं कुर्यात्तथापि वा ॥
प्रातःकाल अथवा पिछले दिन कोई भी मनुष्य भक्तिपूर्वक भिक्षा के लिए निवेदन करे, तो उसके यहाँ जो भिक्षा ग्रहण की जाती है, उसे प्राकृप्रणीत भिक्षा कहते हैं।
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