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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 52
निर्धावं निरहंकारं निर्मनस्कमनीहिंतम्। केवलास्पन्दशुद्धात्मन्येव तिष्ठति मे रिपुः॥
(मैं) भाव शून्य, अहंकाररहित, मनः शून्य, चेष्टारहित, स्पन्द विहीन तथा केवल शुद्ध आत्मा स्वरूप हूँ। मेरा शत्रु कहाँ हो सकता है?
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