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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 20
शास्त्रज्ञानात्पापपुण्यलोकानुभवश्रवणात्प्रपञ्चोपरतो देहवासनां शास्त्रवासनां लोकवासनां त्यक्त्वा वमनान्नमिव प्रवृत्तिं सर्वं हेयं मत्वा साधनचतुष्टयसंपन्नो यः संन्यस्यति स एव ज्ञानसंन्यासी ॥
शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करके, पाप-पुण्य तथा सांसारिक अनुभवों का विवेकपूर्वक विचार कर, प्रपञ्च से परे (उपराम) होकर, शरीर-वासना (पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लौकैषणा), शास्त्र-वासना (शास्त्रों पर अत्यधिक निर्भर रहना) तथा लोक-वासना (लौकिक व्यवहारों की प्रमुखता) का परित्याग करके, समस्त प्रकार की सांसारिक प्रवृत्तियों को वमन किए हुए अन्न के समान त्याज्य मानकर तथा साधनचतुष्टय (विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व) से सम्पन्न होकर जो संन्यास-धर्म को स्वीकार करता है, उसे ज्ञान संन्यासी कहा गया है।
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