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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 1
चत्वारिंशत्संस्कारसंपन्नः सर्वतो विरक्तश्चित्तशुद्धिमेत्याशासूयेष्र्ष्याहंकारं दग्ध्वा साधनचतुष्टयसंपन्न एव संन्यस्तुमर्हति ॥
चालीस संस्कारों से सम्पन्न तथा समस्त विषयों से वैराग्य प्राप्त करने वाला पुरुष, चित्तशुद्धि को प्राप्त करके, आशा, असूया (दोषदृष्टि), ईर्ष्या तथा अहंकार को दग्ध कर, साधनचतुष्टय (विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व)
  1. विवेक (नित्यानित्य वस्तु का ज्ञान)
  2. वैराग्य (लौकिक एवं पारलौकिक भोगों की इच्छा का न होना)
  3. षट्सम्पत्ति (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान एवं श्रद्धा)
  4. मुमुक्षुत्व (मोक्ष की प्रबल इच्छा)
से सम्पन्न होने पर ही संन्यास ग्रहण करने का अधिकारी होता है।
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