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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 116
रध्यायां बहुवस्त्राणि भिक्षा सर्वत्र लभ्यते। भूमिः शय्यास्ति विस्तीर्णा यतयः केन दुःखिताः ।।
गलियों (वीथियों) में बहुत से पुराने वस्त्र प्राप्त हो जाते हैं तथा भिक्षा भी सर्वत्र उपलब्ध होती रहती है। पृथ्वी पर कहीं भी शयन करने का स्थान मिल सकता है, तो फिर संन्यासी को और किस बात का दुःख है?
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