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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 61
सा सत्यता सा शिवता सावस्था पारमात्मिकी। सर्वज्ञता सा संतृप्तिर्नतु यत्र मनः क्षतम् ॥
वही सत्यता है, वही शिव स्वरूप है, उसमें ही परमात्मा अवस्थित है। वही सर्वज्ञता है, वही सम्पूर्ण तृप्ति है, न कि जहाँ मन क्षतिग्रस्त (मेरे-तेरे में बंटा हुआ) हो।
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