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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 40
अनन्तानन्दसंभोगा परोपशमशालिनी। शुद्धेयं चिन्मयी दृष्टिर्जयत्यखिलदृष्टिषु ॥
यह पवित्र चिन्मय दृष्टि अन्तरहित, शाश्वत, आनन्द का उपभोग करने वाली एवं अत्यन्त शान्ति प्रदान करने वाली है। यह अन्य समस्त दृष्टियों पर विजय पाने वाली है।
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