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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 72
इत्येवं चिन्तयन्धिक्षुः स्वरूपस्थितिमञ्जसा। निर्विकल्पस्वरूपज्ञो निर्विकल्पो बभूव ह ॥
इस प्रकार भिक्षु निरन्तर चिन्तन करता हुआ सहज ही स्वरूपस्थिति को प्राप्त हो गया। निर्विकल्पस्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके वह स्वयं निर्विकल्प हो गया।
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