तद्यथेति । दृष्टानुश्रविकविषयवैतृष्ण्यमेत्य ।
प्राक्पुण्यकर्मविशेषात्संन्यस्तः स वैराग्यसंन्यासी ॥
दृष्ट एवं आनुश्रविक विषयों के प्रति तृष्णारहित होकर तथा पूर्व-जन्म के पुण्यों के फलस्वरूप वैराग्य उत्पन होने के कारण जिस मनुष्य ने संन्यास-धर्म ग्रहण किया है, वह 'वैराग्य संन्यासी' है।
[सांख्य-योग की मान्यतानुसार 'दृष्ट' विषय वे हैं, जो इस लोक में 'दृष्टिगोचर होते हैं, जैसे-रूच, रस, गध आदि, धन-सम्पत्ति, स्त्री, राज ऐश्वर्य इत्यादि।' आनुश्वविक' विषय वे हैं, जो बेद और शास्त्रों द्वारा सुने गए हैं, ये भी दो प्रकार के होते हैं (क) देवलोक, स्वर्ग, विदेह और प्रकृतिलय का आनन्द (ख) दिव्य गन्ध-रस आदि, अणिमा-गरिमा-महिमा आदि सिद्धियाँ। वैराग्य संन्यासी उक्त दोनों प्रकार के विषयों से विरक्त होता है।]
पूरा ग्रंथ पढ़ें
संन्यास के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।