नीरुजश्च युवा चैव भिक्षुर्नावसथे वसेत्।
परार्थं न प्रतिग्राह्यं न दद्याच्च कथंचन ॥
स्वस्थ तथा युवावस्था को प्राप्त हुए संन्यासी को कभी भी किसी के घर में नहीं रुकना चाहिए। दूसरे किसी की कोई भी वस्तु न लेनी चाहिए और न ही किसी को अपनी वस्तु देनी चाहिए।
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