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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 69
संकल्पपादपं तृष्णालतं छित्त्वा मनोवंनम् । विततां भुवमासाद्य विहामि यथासुखम् ॥
मैं संकल्प रूपी वृक्षों तथा तृष्णा रूपी लताओं को काटकर मन रूपी विशाल वन को पार कर विस्तृत भूमि (मैदान) में पहुँचकर आनन्द पूर्वक विचरण करता हूँ।
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