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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 63
मलं संवेद्यमुत्सृज्य मनो निर्मूलयन्परम्। आशापाशानलं छित्त्वा संविन्मात्रपरोऽस्म्यहम् ॥
संवेद्यरूपी मन को दूर करके तथा मन को निर्मूल (इच्छारहित) बना, आशा रूपी फन्दे को काटकर, मैं केवल संवित्स्वरूप ही हूँ।
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