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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 65
आत्मतापरते त्यक्त्वा निर्विभागो जगत्स्थितौ । वज्रस्तम्भवदात्मानमवलम्ब्य स्थिरो ऽस्म्यहम्। निर्मलायां निराशायां स्वसंवित्तौ स्थितोऽस्म्यहम् ॥
राग एवं द्वेष के भावों का परित्याग करके, विभागरहित, नश्वर जगत् में प्रतिष्ठित अत्यधिक विशेष रूप से दृढ़ आत्मारूपी साम्य के आश्रय में मैं पूर्णरूप से प्रतिष्ठित हूँ। मैं अपनी निर्मल एवं आशारहित संवित् (आत्मिक दशा) में प्रतिष्ठित हैं।
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