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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 112
अन्नपानपरो भिक्षुर्वस्त्रादीनां प्रतिग्रही। आविकं वानाविकं वा तथा पट्टपटानपि ॥
खाने-पीने वाले पदार्थों को सतत इच्छा रखने वाला एवं वस्त्रों में ऊनी वस्त्रों अथवा बिना ऊन से निर्मित बस्त्र, रेशमी बस्त्रादि वस्तुओं को स्वीकार करने से संन्यासी का निश्चित रूप से अधःपतन हो जाता है।
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