मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 30
जगत्तावदिदं नाहं सवृक्षतृणपर्वतम्। यद्वाह्यं जडमत्यन्तं तत्स्यां कथमर्ह विभुः । कालेनाल्पेन विलयी देहो नाहमचेतनः ॥
यह वृक्ष, घास-पात, पर्वत आदि सम्पूर्ण विश्व मुझसे अलग है। बाह्य जगत् में जो कुछ भी दृष्टिगोचर हो रहा है, वह अत्यन्त जड़ है। मैं उसमें किस प्रकार स्थित रह सकता हूँ? क्योंकि मैं विराट् हूँ। मैं काल के द्वारा कल्पित तथा शीघ्र ही विलीन होने वाला भी नहीं हूँ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
संन्यास के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

संन्यास के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें