यह वृक्ष, घास-पात, पर्वत आदि सम्पूर्ण विश्व मुझसे अलग है। बाह्य जगत् में जो कुछ भी दृष्टिगोचर हो रहा है, वह अत्यन्त जड़ है।
मैं उसमें किस प्रकार स्थित रह सकता हूँ? क्योंकि मैं विराट् हूँ। मैं काल के द्वारा कल्पित तथा शीघ्र ही विलीन होने वाला भी नहीं हूँ।
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