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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 30
जगत्तावदिदं नाहं सवृक्षतृणपर्वतम्। यद्वाह्यं जडमत्यन्तं तत्स्यां कथमर्ह विभुः । कालेनाल्पेन विलयी देहो नाहमचेतनः ॥
यह जो वृक्ष, घास-पात, पर्वत आदि सम्पूर्ण विश्व है, वह मेरे से अलग है। जो कुछ बाह्य जगत् में दृष्टिगोचर हो रहा है, वह अत्यन्त जड़ है। मैं किस तरह उसमें स्थित रह सकता हूँ; क्योंकि मैं विराट् हूँ, काल के द्वारा कल्पित एवं जल्दी ही विलय होने वाला भी मैं नहीं हूँ।
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