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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 120
सर्वेषामेव पापानां सङ्घाते समुपस्थिते। तारं द्वादशसाहस्त्रमभ्यसेच्छेदनं हि तत् ॥
यद्यपि किसी कारणवश पाप-प्रसङ्ग उपस्थित हो जाए, तो बारह हजार की संख्या में तारक मंत्र का जाप करके, उस पाप को विनष्ट कर देना चाहिए।
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