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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 7
व्रतयज्ञतपोदानहोमस्वाध्यायवर्जितम्। सत्यशौचपरिभ्रष्टं संन्यासं नैव कारयेत्। एते नार्हन्ति संन्यासमातुरेण विना क्रमम् ॥
जो व्यक्ति व्रत, यज्ञ, तप, दान, होम और स्वाध्याय से रहित हो, तथा सत्य और शौच (बाह्य एवं आन्तरिक पवित्रता) से भ्रष्ट हो गया हो, उसे संन्यास नहीं दिलाना चाहिए। ये सभी व्यक्ति सामान्य विधि से संन्यास के अधिकारी नहीं हैं; केवल आतुर-संन्यास (मृत्युकाल अथवा अत्यन्त आपात स्थिति में दिया जाने वाला संन्यास) के अपवाद को छोड़कर।
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