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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 98
यतेः संव्यवहाराय पात्रलोपः स उच्यते। गृहीतस्य तु दण्डादेर्द्वितीयस्य परिग्रहः ॥
उनके खो जाने पर दूसरे के पात्रों को ले लेना ही पात्र लोप है। अपना दण्ड खो जाने पर दूसरे का दण्ड ग्रहण कर लेना हो परिग्रह है।
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