तुरीयातीत संन्यासी सब कुछ त्याग देने वाला, गोमुख-वृत्ति वाला तथा केवल तीन गृहों से फल अथवा अन्न की भिक्षा ग्रहण करने वाला होता है।
वह अपना शरीरनग्न रखता है (अर्थात् बिना वस्त्र आदि के)। वह अपने शरीर को मृत के समान मानकर किसी प्रकार जीवन-निर्वाह करता है।
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