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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 28
तुरीयातीतो गोमुखवृत्त्या फलाहारी अन्नाहारी । चेद्‌गृहत्रये देहमात्रावशिष्टो दिगम्बरः कुणपवच्छरीरवृत्तिकः॥
'तुरीयातीत' संन्यासी सब कुछ त्याग देने वाला, गोमुख वृत्ति वाला, तीन गृहों से फल अथवा अन्न की भिक्षा लेने वाला, अपना शरीर नग्न रखने वाला अर्थात् बिना वस्त्रादि के शरीर को रखने वाला होता है। वह अपने शरीर को मरे हुए की भाँति जान करके किसी तरह जीवन निर्वाह करता है।
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