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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 24
कुटीचकः शिखायज्ञोपवीती दण्डकमण्डलुधरः कौपीनशाटीकन्धाधरः पितृमातृगुर्वारा-धनपरः पिठरखनित्रशिक्यादिमात्रसाधनपर एकत्रान्नादनपरः श्वेतोर्ध्वपुण्ड्रधारी त्रिदण्डः ॥
कुटीचक संन्यासी शिखा (चोटी) एवं यज्ञोपवीत को अपने शरीर में धारण किये रहता है। इसके अतिरिक्त वह दण्ड, कमण्डलु, कौपीन (लँगोटी), चादर, कंथा (कथरी) को ग्रहण करने वाला, माता-पिता तथा गुरु की आराधना करने वाला; बटलोई, कुदाली और छीका मात्र अपने पास रखने वाला तथा एक ही जगह पर भोजन करने वाला, ऊपर की ओर श्वेत त्रिपुष्डू मस्तक में धारण करने वाला और त्रिदण्ड भी धारण करने वाला होता है।
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