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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 36
निर्मयोऽमननः शान्तो गतपञ्चेन्द्रियभ्रमः । शुद्धचेतन एवाहं कलाकलनवर्जितः ॥
मैं (संन्यासी) पञ्चेन्द्रियों के भ्रम से रहित, मननरहित, शान्तस्वरूप तथा मलिनतारहित शुद्ध चैतन्य मात्र हूँ।
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