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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 53
तृष्णारज्जुगणं छित्त्वा मच्छरीरकपञ्जरात्। न जाने क्व गतोड्डीय निरहंकारपक्षिणी ॥
मेरे शरीर रूपी पिंजड़े में निवास करने वाली निरहंकारिता रूपी पक्षिणी, तृष्णा रूपी रज्जु (रस्सी) को काटकर न जाने कहाँ उड़कर चली गई।
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