संन्यासी को चाहिए कि वह अपने अतिरिक्त सभी का त्याग करके अपने हाथरूपी पात्र से मधुकरी-वृत्ति द्वारा जीवन-यापन करे।
इस प्रकार जीवन-यापन करने से उसके शरीर में चर्बी की वृद्धि नहीं होती। उसे सदा विचरण करते रहना चाहिए।
वह हाथरूपी पात्र अथवा मुखरूपी पात्र द्वारा भिक्षा ग्रहण करते हुए जीवन व्यतीत करे।
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