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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 75
स्वव्यतिरिक्तं सर्वं त्यक्त्वा मधुकरवृत्त्याहारमाहरन्कृशीभूत्वा मेदोवृद्धिमकुर्वन्विहरेत् । माधुकरेण करपात्रेणास्यपात्रेण वा कालं नयेत्। आत्मसंमितमाहारमाहरेदात्मवान्यतिः ॥
संन्यासी को चाहिए कि वह अपने अतिरिक्त सभी का त्याग करके अपने हाथ रूपी पात्र से मधुकरी वृत्ति पर जीवनयापन करे। जिससे कि उसके शरीर में चर्बी की वृद्धि न हो तथा उसको सतत विचरण करते रहना चाहिए। वह हाथ रूपी पात्र के द्वारा या मुख रूपी पात्र के द्वारा भिक्षा ग्रहण करते हुए जीवन व्यतीत करे।
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