चेष्टा और चेष्टारहितता तथा हेय एवं उपादेय की भावना से मैं मुक्त हो चुका हूँ।
मैं आत्मिक सन्तोष को कब प्राप्त करूँगा? स्वयंप्रकाशस्वरूप पद में कब प्रतिष्ठित होऊँगा?
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