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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 57
ग्राह्यग्राहकसंबन्धे क्षीणे शान्तिरुदेत्यलम्। स्थितिमभ्यागता शान्तिर्मोक्षनामाभिधीयते ॥
ग्राह्य एवं ग्राहक का सम्बन्ध विनष्ट हो जाने के पश्चात् स्थिर शान्ति का उदय होता है, इस कारण शान्ति को ही मोक्ष कहा जाता है।
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