सा हि वाचामगम्यत्वादसत्तामिव शाश्वतीम्।
नैरात्मसिद्धात्मदशामुपयातैव शिष्यते ।।
यह वाणी से जानी नहीं जा सकती।
यह शाश्वत है। यह असत्ता तथा निरति आत्मा के सदृश नहीं है, बल्कि उनसे परे स्थित रहती है।
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