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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 43
सा हि वाचामगम्यत्वादसत्तामिव शाश्वतीम्। नैरात्मसिद्धात्मदशामुपयातैव शिष्यते ।।
यह वाणी से न जाने जा सकने वाली है। शाश्वत असत्ता तथा निरति आत्मा के सदृश नही शेष रहती है।
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