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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 87
चरेन्माधुकरं भैक्षं यतिम्लेंच्छकुलादपि। एकान्त्रं नतु भुञ्जीत बृहस्पतिसमादपि। याचितायाचिताभ्यां च भिक्षाभ्यां कल्पयेत्स्थितम् ॥
यदि संन्यासी को भिक्षा की विशेष आवश्यकता पड़ जाये, तो उसे म्लेच्छ के यहाँ से भी भिक्षा माँग लेनी चाहिए; परन्तु कभी भी एक ही स्थान से आहार स्वीकार नहीं करना चाहिए। चाहे वह बृहस्पति के सदृश पूज्य का ही घर क्यों न हो? संन्यासी को सर्वदा 'याचित' अथवा 'अयाचित' भिक्षा के द्वारा निर्वाह करना सर्वथा उचित है।
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