यदि संन्यासी को भिक्षा की विशेष आवश्यकता पड़ जाए, तो उसे म्लेच्छ के यहाँ से भी भिक्षा माँग लेनी चाहिए; परन्तु कभी भी एक ही स्थान से आहार स्वीकार नहीं करना चाहिए, चाहे वह बृहस्पति के समान पूज्य व्यक्ति का ही घर क्यों न हो।
संन्यासी को सदा याचित अथवा अयाचित भिक्षा के द्वारा ही अपना निर्वाह करना सर्वथा उचित है।
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