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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 59
पावनी परमोदारा शुद्धसत्त्वानुपातिनी। आत्मध्यानमयी नित्या सुषुप्तिस्थेव तिष्ठति ॥
वह पतित-पावन, परम उदार, शुद्ध सत्य को आत्मसात् करने वाले, आत्मध्यान सम्पन्न एवं अपने-अपने नित्य स्वरूप में प्रतिष्ठित रहते हैं।
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