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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 45
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन जन्तवः । धराविवरमग्नानां कीटानां समतां गताः ॥
इच्छा एवं द्वेष से प्रादुर्भूत द्वन्द्वभाव के कारण ये मोहवश पृथिवीरूपी गड्ढे में पतित हुए कृमि-कीटकों के ही समान है।
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