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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 121
यस्तु द्वादशसाहस्त्रं प्रणवं जपते ऽन्वहम् । तस्य द्वादशभिर्मासैः परं ब्रह्म प्रकाशते इत्युपनिषद् ॥
जो संन्यासी नित्य-प्रतिदिन बारह हजार बार ॐकार रूपी प्रणव मंत्र का जप करता है, उसे बारह मास के अन्दर ही अविनाशी परब्रह्म का (अपने इष्ट का) साक्षात्कार हो जाता है। ऐसी यह (रहस्यमयी संन्यास) उपनिषद् है।
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