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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 71
स्वच्छतोर्जितता सत्ता हृद्यता सत्यता ज्ञता। आनन्दितोपशमता सदा प्रमुदितोदिता। पूर्णतोदारता सत्या कान्तिसत्ता सदैकता ॥
स्वच्छ, वीर्यवान्, सत्ताशाली, सत्य एवं ज्ञान स्वरूप हो गया हूँ। आनन्द, उपशम, प्रसत्रता, पूर्णता, उदारता, सत्य, द्वैतरहित आदि की भावना करते हुए संन्यासी को अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित रहना चाहिए।
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